रविवार, 24 फ़रवरी 2013
मेरे हिस्से का भारत..........
यूं तो हम सब बचपन से ही अपने-अपने सपने बुनते हैं और उन्ही के हिसाब से हमारे भविष्य की इबारतें समय की छाती पर लिखती जाती हैं, इन सपनों में कई सच होते हैं, कई हमारे लिए 'हथेली में चांद' साबित होते हैं पर हर किसी की अभिलाषा होती है कि एक बार वो अपने हिस्से के चांद को अपनी मुट्ठी में भर कर देखे। मेरे पास भी ऐसे कई सपने हैं और इत्तफाक की बात ये है कि ज्यादातर हथेली में चांद भरने जैसे ही रोमैंटिक हैं।
मुट्ठी में चांद और ग्लोबल विलेज
चांद को अपनी मुट्ठी में करने के सपने ना जाने कितने सालों से इंसान देखता रहा और वैज्ञानिकों ने इस में एक दिन सफलता भी पा ली फिर भी हम (भारतीय) उसे अपनी उपलब्धि नहीं मानते, क्यों भला ? जाहिर सी बात है कि जब इंसान चांद पर पहुंचा तो वह मानव जाति की जीत थी पर उस में भारत का एक राष्ट्र के बतौर कोई हिस्सा नहीं था। इसलिए हमें भी अपने हिस्से का चांद चाहिए है और इसी कोशिश में हमारे (भारतीय) वैज्ञानिक रात-दिन एक कर रहे हैं।
अब सपनों की करामात ये है कि ये अपने और पराये के भेद को समझते ही नहीं हैं। अक्सर कहने लगते हैं कि जब इंसान एक बार चांद पर पहुंच गया तो हमें वहां अलग से जाने की क्या जरूरत है आखिर हम सब ग्लोबल विलेज (विश्वग्राम) के वासी जो हैं। 'वसुधैव कुटुंबकम' हमारी नीति है और जब हम पूरे विश्व को अपना परिवार समझते हैं तो आखिर इतने बड़े परिवार का एक-एक सदस्य अगर चांद पर जाने की जिद करने लगे (जैसे हमारे श्रीराम ने की थी कि 'मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैंहो' ) तो भला धरती के एक-एक बच्चे की मुट्ठी में चांद कैसे रखा जा सकता है।
मैने भी सपनों की बातों को मुंहतोड़ जवाब देने की सोच ली और तुरंत कहाकि ग्लोबल विलेज में भी अपने-पराये का भेद कैसे खत्म हो सकता है, वसुधैव कुटुंबकम हमारी नीति है तो पर ये तो वैसे ही है जैसे किसी गांव को संपूर्ण रूप से एक परिवार माना जाता है पर उनके व्यक्तिगत सुख-दुख भी तो होते हैं। इसलिए इस कुटुंब के एक सदस्य होने के नाते वसुधा में एक हिस्सा भारत का भी बनता है। उसी तरह भारत का एक वैज्ञानिक भी अगर चांद पर पहुंच जाये तो ये पूरे भारत की उपलब्धि है, हर व्यक्ति ना चांद पर जा सकता है ना उसकी जरूरत है।
मेरे हिस्से का भारत भी कुछ ऐसा ही है, जहां पूरे देश की उपलब्धियों में अपने-अपने हिस्से की मांग करते हुए मेरे साथ ना जाने कितने हाथ खड़े हैं, जिन्हे इस देश के वासी होने के नाते अपने-अपने हिस्से और अपनी-अपनी जमीन चाहिए। ये भारत के हिस्से हैं और इसलिए भारत में भी उनका हिस्सा है पर ये बातें सपनों की हैं। हकीकत इस से बहुत दूर लगती है, लेकिन बहस जारी है, संघर्ष जारी है, भारत की उपलब्धियों को उन मुट्ठियों तक पहुंचाने की जो अपना हिस्सा पाने की उम्मीद के साथ खुलना सीख रही हैं।
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