रविवार, 10 मार्च 2013

अर्थव्यवस्था और एशियन ब्राउन क्लाउड

कुछ होने और कुछ ना होने के बीच एक बेचैनी होती है जो बाहर से एक धुंध की तरह दिखती है, ऐसा लगता है कि आसमान में भूरे बादल छा गये हों जिन्हे देख कर ये तय करना मुश्किल होता है कि ये बरसेंगे या सिर्फ छाये रहेंगे। पयार्वरण से जुड़े लोग एसे ABC परिघटना या एशियन ब्राउन क्लाउड के तौर पर भी समझ सकते हैं। एशिया में पानी बरसने के पैटर्न बदलने के पीछे इसे एक जिम्मेदार कारक के रूप में परिभाषित किया जाता है। ऐसी ही धुंध भारत की अर्थव्यवस्था पर छायी हुई भी लगती है। राजनीतिक-क़ॉरपोरेट प्रदूषण से जन्मे इस भूरे बादल को  छांटना आसान नहीं है।

बाहर से ये धुंध अक्सर कन्फ्यूजन की तरह दिखती है पर इसके परिणामों के बारे में तय करना आसान नहीं है, हां जब हम इससे बाहर निकल जाते हैं तब जान पाते हैं कि इसने हमें क्या दिया या हमसे क्या ले लिया। वैश्विक मंदी के बाद (2007-2008) लगभग हर साल यूपीए सरकार ने हमारी अर्थव्यवस्था पर इस भूरे बादल के प्रभाव को नगण्य ही बताया है इसके बावजूद असर बढ़ता गया है और हालिया बजट पेश करने के साथ ही वित्त मंत्री जी ने 'सबसे बुरा दौर' गुजर जाने का आश्वासन भी दिया है।

इस दौर को आजकल की शब्दावली में अक्सर ट्रांजिशन फेज कहते हैं। अब ये शब्द बेहद कॉमन हो गया है। जहां कुछ भी समझ में आना बंद हो जाये वहां दन्न से इसका इस्तेमाल करने का प्रचलन है। इससे आपके विष्लेषण में एक चमकीला बौद्धिक रैपर लिपट जाता है जो अंदर के सामान को बाहरी हवा और नमी के असर से बचाये रखता है और अंदर का सामान ताजा बना रहता है-एक टिन फॉयल की तरह। इसकी उपयोगिता के बारे में आधुनिक गृहणियां अच्छे से जानती हैं।

देखना ये है कि इस ट्रांजिशन फेज के गुजर जाने के बाद हमारे हाथ क्या लगता है और इसके बारे में भविष्यवाणी करना सबसे आसान होते हुए भी सबसे मुश्किल है। 



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