शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

साल 2015......नाउम्मीदी के अंधेरे में खौलता साज-ओ-सामान

कुछ बीता. कुछ बचा और ऐसा बहुत कुछ अनजाना रह गया जिसे बस हमारे चारों ओर तिरते ही रहना है, समय बीतने के एहसास को गिनते जाना एक खलबली पैदा करता है पर हम हर साल ऐसा करते हैं और इस साल भी जरूर करेंगे। पुराना साल जाते -जाते एक हमारे दिमाग र एक साल का आर्काइव छोड़ जाता है, हर किसी का रिकॉर्ड बिल्कुल अलग होता है। इन्ही रिकॉर्डों के आस-पास इंसान की दुनिया घूमती रहती है, पुराना नये से जुड़ता रहता है और बहुत कुछ छूटने के बोध के साथ-साथ बार-बार खुद-ब-खुद उभरता भी रहता है। साल 2015 की शुरुआत कुछ ऐसी ही है। जहां नयेपन  के अभाव में तिरती खामोशी और उल्लास की चाह में सुलगती रोजमर्राह की जिंदगी अब बिल्कुल मकबरे की जैसी लगने लगी है। एक चमकदार-शानदार मकबरा जिसे देखने हजारों-हजांर लोग रोज आते हैं पर जिसके अंदर कभी कुछ नहीं बदलता वो सदियों सदी से परिवर्तन की राह देखता हुआ आने वाली कई सदियों तक यूं ही  बने रहने को अभिशप्त होता है।

साल  2015 का आगाज मेरे जीवन में कुछ ऐसा ही है। फिल्मों, किताबों, घूमने और बतियाने के आवारा शौकों के बीच मध्यमवर्गीय गृहिणी का जीवन जीना कुछ ऐसा है जो दो अलग-अलग दुनियाओं में जीना। कभी यहां तो कभी वहां। एक दूसरे से निपट विरत, नितांत अबूझे इन दो दुनिया में एक आभासी और दूसरी वास्तविक है। वर्तमान युग की तरह आभासी दुनिया मेरी दिल की दुनिया है और वास्तविक दुनिया भी अब पहले की तरह वो दुनिया नहीं रही है जिसमें मैं खुच ब खुद बंध गयी थी, ये भी मेरी रची हुई और कहीं न कहीं चुनी गयी दुनिया है, इन्ही सब के बीच साल दर साल आ-जा रहे हैं। ऐसा लगता है समय मानो मेरे लिये ठहर गया है, दिन तो बीतते हैं पर अनुभव नहीं बदलते, सांस तो आती है पर बासीपन की सड़ांध समाई रहती है जीवन में। ताजगी, सार्थकता, सपनों के अभाव में जिंदा रहना केवल कुंठाओं के अगार में समाने जैसा लगता है।

कहने के लिये बहुत कुछ है, सुनने के लिये धीरज भी
पर रास्ता हां रास्ता नहीं मिलता
उम्मीदों के सोते को तलाश करते
एक और साल बीता
अब भी नहीं मिला कुछ ऐसा
जो बता सके मुझ में भी  है कुछ सार्थकता
इधर नया साल भी गले आ लगा
शंकाओं के लोकतंत्र में गुजरे एक और साल की याद दिलाता
हर बार की तरह क्या यह साल भी यूं ही चला जायेगा
मिठास के सपने बेचकर सैक्रीन घुला जहर खिलाकर
आशाओं की चाशनी में लपेटे बेहतर भविष्य के सपने दिखाकर
साल 2015 आया है
उम्मीद के धुंधले होते मौसम और हवाओं को साथ लेकर
कुंठाओं के बर्फानी तूफानों से लैस, अकेलेपन की सुनामी के साथ
देखो, खुद को बचाना जरूर है इस मार से
क्योंकि नया साल जिंदा रहने वालों के लिये आता है
मरे हुए शिकार को वो हाथ भी नहीं लगाता
तो नये साल का स्वागत इस आस के साथ
कि अगले साल भी टिक सकूं इस नाउम्मीदी के गणतंत्र में
लिख सकूं गीत उदासी और मायूसी के


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें