यह आलेख पिछले साल गैर सरकारी संगठनों के काम-काज पर संदेह व्यक्त करने वाली आई बी की एक रिपोर्ट आने के बाद लिखा गया था और एक हिन्दी पत्रिका गांव-जहान में प्रकाशित हो चुका है। इस बहस में इन दिनों आया परिवर्तन यह है कि दो दिन पूर्व 'ग्रीनपीस' की महान के जंगलों में काम कर रही कैंपेनर प्रिया पिल्लई को दिल्ली हवाई अड्डे से ब्रिटेन के लिये उड़ान पकड़ने पर भारत सरकार ने रोक लगा दी जबकि उनके पास सभी आवश्यक कागजात थे और उनकी यात्रा का उद्देश्य ब्रिटेश कंपनी एस्सार के मध्य प्रदेश के महान जंगलों में की जा रही गतिविधियों के बारे में ब्रिटिश संसद को संबोधित करना था। भारत सरकार ने एक बार फिर प्रिया पिल्लई पर रोक लगाकर इस प्रश्न को प्रासंगिक बना दिया है कि खुद चुनावी चंदे के रूप में विदेशी संस्थाओं से हजारों-करोड़ों लेने वाली ये राजनीतिक पार्टियां, आम भारतीय जनता को आई बी की रिपोर्ट दिखा कर एनजीओ को संदिग्सध कैसे बता सकती हैं? इसी बहस को ताजा करने के उद्देश्य से यह आलेख साझा कर रही हूं।
विदेशी चंदा: एनजीओ या धंधा
एनजीओ को मिल रही विदेशी
मदद को सेकर सरकार सशंकित लेकिन खुद ले रही है चुनावी चंदा
हाल ही में, आई बी की मीडिया में लीक हुई
रिपोर्ट ने देश में गैर सरकारी संगठनों के काम-काज और तौर-तरीकों पर बड़े अहम सवाल
खड़े किये हैं। इस रिपोर्ट में कुछ एनजीओ को विदेशी धन का इस्तेमाल कर देश की बड़ी
विकास परियोजनाओं को रोकने का आरोप लगाया गया है। इस रिपोर्ट में यह भी अनुमान
व्यक्त किया गया है कि ये राष्ट्रीय, अंतरार्ष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन देश की
घरेलू विकास दर को बड़े स्तर पर प्रभावित कर रहे हैं और देश विरोधी गतिविधियों में
संलिप्त हैं। ग्रीनपीस, एमनेस्टी इंटरनेशनल, पीयूसीएल और एक्शन फॉर ऐड जैसे
नामी-गिरामी एनजीओ के नाम इस रिपोर्ट में हैं और उनके कुछ कार्यकर्ताओं की
गतिविधियों के विवरण भी रिपोर्ट के लीक हुए अंशों में दिये गये हैं।
इस रिपोर्ट के मीडिया में आने के तुरंत बाद से
ही एक बहस चल पड़ी है कि क्या वाकई यह गैर सरकारी संगठन विदेशी पैसे की मदद से देश
में नकली जनआंदोलन खड़े कर बड़ी विकास परियोजनाओं को आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं।
सुस्त आर्थिक विकास दर, लगातार चढ़ती महंगाई और भयानक बेरोजगारी से त्रस्त आम जनता
के लिये ये खबर ज़हर बुझे तीर के समान है। लोग आगबबूला होकर इन एनजीओ के फेसबुक
पेज और वेबसाइटों पर अपना गुस्सा निकाल रहे हैं। दूसरी ओर जनता का एक बहुत बड़ा
हिस्सा एनजीओ की कार्य संस्कृति को लेकर सशंकित है पर चुप होकर ये तमाशा देख रहा
है।
दरअसल यह पहली बार नहीं है जब एनजीओ पर विदेशी
पैसों से संचालित होने के आरोप लगे हैं। पहले भी समय-समय पर इस तरह के खुलासे मीडिया में
होते रहे हैं और यह संदेह व्य्क्त किया जाता रहा है कि बहुत से एनजीओ गैरकानूनी गतिविधियों
में संलग्न हैं जिनमे पैसे के लेन-देन से लेकर अन्य हर तरह की अनियमितता और
धोखाधड़ी शामिल है। आईबी की रिपोर्ट ने इन संदेहों का दायरा बहुत व्यापक कर दिया
है लेकिन सवाल यह उठता है कि अचानक यह एनजीओ इस कदर कैसे प्रभावी हो गये कि वे देश
की आर्थिक विकास दर को 2-3 प्रतिशत तक सुस्त करने के लिये उत्तरदायी हो गये।
राजनीतिक पार्टियां
निष्क्रिय क्यों?
इस सवाल की तहें देश में आर्थिक उदारीकरण के बाद
सरकारों की घटती लोक कल्याणकारी भूमिका में निहित हैं। आर्थिक उदारीकरण के विकास
का मॉडल अपनी शुरुआत से ही बेहद विवादास्पद रहा है और साल 2007 में आयी वैश्विक
मंदी के बाद आम जनता ने इस मॉडल को लगभग नकार दिया है। महंगाई, बेरोजगारी, विकास
दर, घरेलू बचत लगभग सभी अहम मोर्चों पर यह मॉडल पछाड़ें खा रहा है।
पूरे देश में इन नीतियों के खिलाफ गुस्सा है और
असंगठित जनांदोलन हर जगह जबरिया कुचले जा रहे हैं। जल-जंगल-जमीन से लेकर पेंशन,
ग्रेचुएटी और लोक कल्याणकारी योजनायें सभी को फिजूलखर्ची बता कर आम जनता पर एक के
बाद एक करों का बोझ बढ़ता चला गया है। देश की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियां इन
आर्थिक नीतियों के खिलाफ उबल रहे जन आक्रोश को संबोधित कर पाने में असमर्थ रही
हैं। ऐसे में, एनजीओ एक ऐसे तबके के रूप में उभरा है जो लगभग हर आमफहम मोर्चे पर सरकारों,
कॉरपोरेट या माफिया के खिलाफ खड़े होकर आम लोगों की मदद को आगे आता रहा है और
समय-समय पर इनके हस्तक्षेप से आम लोगों की व्यक्तिगत और सामूहिक समस्यायें कम होती
रही हैं।
राजनैतिक शून्य को भरते
एनजीओ
एनजीओ ने उस खालीपन को भरा है जो राजनीतिक
पार्टियों की भ्रष्ट कार्यसंस्कृति की वजह से और मीडिया के कॉरपोरेट हाथों में
केंद्रित होने की वजह से आम जनता और सत्ताधारियों के बीच खड़ा हो गया है। बंधुआ
मजदूरी, अंग व्यापार, महिला एवं बाल वेश्यावृत्ति, घरेलू हिंसा और मलिन बस्तियों
में पनप रहे अपराधों से लेकर खनन और रियल्टी सेक्टर, स्वास्थ्य सुविधायें, शिक्षा
क्षेत्र और तो और यातायात एवं परिवहन तक में फैली धोखाधड़ी, लूट-मार और अराजकता के
खिलाफ भीएनजीओ के लोग आम जनता के साथ खड़े होकर उनके हक में लड़ रहे हैं।
न्यायालयों ने भी कई बार पीआईएल के बहाने एनजीओ द्वारा उठाये गये सामाजिक प्रश्नों और
समस्याओं को संबोधित कर लोगों का साथ दिया है। इस तरह हर ओर से ठगी जनता धीरे-धीरे
इन एनजीओ पर भरोसा करने लगी है। ऐसे बहुत से एनजीओ हैं जो इस तरह के कामों का
संचालन देशी-विदेशी पैसे की मदद से कर रहे हैं।
पारदर्शिता जरूरी लेकिन
निशाने पर केवल एनजीओ
ऐसे माहौल में आयी इस रपट ने एनजीओ पर लोगों के
भरोसे को तोड़ा है लेकिन यह भी सच है कि इसी बहाने सार्वजनिक संस्थाओं के वित्तीय
लेन-देन में पारदर्शिता का प्रश्न फिर प्रासंगिक हो गया है। सार्वजनिक संस्थाओं
में न केवल एनजीओ बल्कि राजनीतिक पार्टियों भी आती हैं। लोकतंत्र में राजनीतिक
पार्टियों के बही-खातों में अपारदर्शिता सीधे चुनावी भ्रष्टाचार को जन्म देता है
जो आगे जाकर लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है। इसलिये केवल एनजीओ ही क्यों
बल्कि राजनीतिक पार्टियों के चुनावी चंदे या कोष की जांच भी होनी चाहिये क्योंकि
सही मायने में ये एनजीओ राजनीतिक पार्टियों के हिस्से का कार्य कर रहे हैं। आम
जनता की समस्याओं का प्रतिनिधित्व और जनआंदोलनों का नेतृत्व राजनीतिक पार्टियों का
काम है फिर इस काम को छिनता देख कर भी यह राजनीतिक पार्टियां एनजीओ पर कभी सवाल
क्यों नहीं करतीं। उनकी यह चुप्पी बेहद संदेहास्पद है।
विदेशी चुनावी चंदा मसला
क्यूं नहीं
यह बेहद चिंतनीय मसला है कि देश में मल्टी नेशनल
कंपनी पॉस्को का उड़ीसा के नियामगिरि जंगलों में सबसे बड़ा विदेशी निवेश है और
उसने इन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस एवं भाजपा दोनों ही पार्टियों को चुनावी चंदा
दिया है। यहां यह बता देना प्रासंगिक होगा कि पॉस्को की परियोजना को नियामगिरि के
स्थानीय लोगों ने वन संरक्षण अधिकार कानून के जरिये आगे बढ़ने से रोक रखा है।
पिछली यूपीए सरकार ने परियोजना को आगे बढ़ाने के
मकसद से इस कानून को लचीला बनाने की कोशिश भी की थी जिसकी आलोचना होने के बाद
उन्हे अपने हाथ वापस खींचने पड़े। ऐसे समय में ग्रीपनीस जो मध्य प्रदेश के
सिंगरौली जिले में महान के जंगलों को बचाने के लिये स्थानीय लोगों के बीच सक्रिय
है उसकी फंडिंग से जुड़े संदेह कहीं न कहीं हमारी सरकारों को भी संदेह के घेरे में
खींचते हैं जिन्हे खुद किसी तरह के विदेशी चुनावी चंदे से परहेज नहीं है। इस
रिपोर्ट ने ऐसे कई सवालों को खड़ा किया है जो एक लोकतंत्र में पूछे ही जाने
चाहिये।
हमें यह भी सोचना होगा कि हमारे जल-जंगल-जमीन की
लड़ाई क्यों विदेशी मदद से लड़ी जा रही है? आखिर हम इन मुद्दों को लेकर इतने खामोश और
निष्क्रिय क्यों हैं? कैसे हमारे जंगल और
जमीन औने-पौने दामों में इन देशी-विदेशी कॉरपोरेट हाथों में चले जा रहे हैं और हम सवाल
भी नहीं उठाते हैं।
कुछ एनजीओ के विदेशी पैसे से संचालित होने की यह
खबर महज एक खबर नहीं बल्कि आदि से लेकर अंत तक भारतीय राजनीतिक पार्टियों की निष्क्रियता
और कॉरपोरेट गोरखधंधों के नाभि-नाल संबंध के कारण पनपती नयी संस्कृति है और इस पर
अंकुश के लिये सार्वजनिक संस्थाओं के वित्तीय लेन-देन में पारदर्शिता जरूरी है
जिनमें एनजीओ से लेकर राजनीतिक पार्टियां और खेल समितियां तक सभी शामिल हैं अन्यथा
थोड़े-बहुत हंगामें के साथ सब कुछ यथावत चलता रहेगा।
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